Monday, 7 March 2016

दोंथा प्रशांत - रोहित के सहपाठी - के 'राष्ट्रवाद' पर विचार



 Our heroes , dead and alive. Jai Bhim !


रोहित वेमुला ने एक लडाई शुरू की मानवता और भाईचारे के लिए , जो लोगो के जाति और समुदायो में विभाजन और व्यक्ति को उसकी इन पहचानो तक सिमित कर देने के विरुद्ध है. यह लडाई बाकी है , यह अपनी दूरदृष्टिता से बाबासाहब बहुत पहले जान चुके थे. 

जब 26 नवम्बर 1949 को जब संविधान सभा ने संविधान का अंगीकार किया था तब संविधान सभा के बीच ‘राष्ट्र’ पर बाबासाहब ने कहा था --
“ हजारो जातियों में विभाजित लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं ? भारत में जातियां हैं. जातियां का अस्तित्व राष्ट्रद्रोह है. क्यूंकि यह सामाजिक जीवन में विच्छेद लाती हैं. यह राष्ट्रद्रोही इसलिए भी हैं क्यूंकि यह जाति की वजह से ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न करती हैं. पर हमको इन सब कठिनाइयों से लड़ना होगा अगर हम वास्तव में राष्ट्र बनना चाहते हैं. बंधुत्व का अस्तित्व तभी होगा जब राष्ट्र होगा. बिना बंधुत्व , समता और स्वतंत्रता के यह सब केवल ऊपरी रंगरोगन (प्रदर्शन) होंगे. ”

बाबासाहब की इस सोच को रोहित वेमुला पोषित कर रहे थे. इसके विपरीत पूरी बीजेपी और आरएसएस कूद पड़ी रोहित वेमुला को राष्ट्रद्रोही चित्रित करने के लिए. दलितों के खिलाफ अपने रुख को दिखाते हुए बीजेपी ने फिर से वी.के.सिंह को पेश किया जिसने पहले भी दो मासूम दलित बच्चो को जानवर(पिल्ले) की संज्ञा दी थी.

हम बाबासाहब के अनुयायी यह दृढ़ता से कहते हैं की भारत अभी एक राष्ट्र में विकसित नहीं हुआ है. भौगोलिक सीमाओं में केवल एक धारणा हैं भारत , पर बंधुत्व की परिभाषा से कोई राष्ट्र की अवधारणा नहीं उभरी है. जब कोई राष्ट्र की अवधारणा है ही नहीं हैं तो राष्ट्रवाद कैसे आ सकता है. अगर राष्ट्रवाद का मतलब ब्राह्मणवाद है -- जो दलितों की हत्या करता है -- तो हम अस्वीकार करते हैं ऐसे राष्ट्रवाद को.

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